
आज के दौर में जहां मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है जहां ज्यादातर बच्चे घंटों स्क्रीन पर गेम और सोशल मीडिया में व्यस्त रहते हैं वहीं वाराणसी में एक ऐसा बच्चा भी है, जिसने अपनी सोच और मेहनत से समाज को नई दिशा देने का काम किया है।

ये कहानी है काशी के लल्लापुरा खुर्द स्थित पिशाच मोचन नई पोखरी मोहल्ले के रहने वाले आर्यन सोनकर की जो खुद पढ़ाई करने के साथ-साथ अपने मोहल्ले के गरीब और जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दे रहा है आर्यन की यह छोटी सी पहल अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है।
वाराणसी के लल्लापुरा खुर्द इलाके की तंग गलियों में इन दिनों एक अनोखी पाठशाला सजती है न कोई बड़ा स्कूल, न कोई आलीशान क्लासरूम और न ही कोई महंगे संसाधन लेकिन यहां मौजूद है सीखने की ललक और बच्चों को शिक्षित करने का जज्बा दरअसल मोहल्ले के रहने वाले आर्यन सोनकर रोजाना गली में बच्चों को इकट्ठा कर उन्हें पढ़ाते हैं। जो बच्चे आर्थिक तंगी या अन्य कारणों से स्कूल नहीं जा पाते उन्हें आर्यन किताबों से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
आर्यन खुद एक छात्र हैं लेकिन कम उम्र में ही उन्होंने यह समझ लिया कि शिक्षा ही समाज को बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है यही वजह है कि पढ़ाई के बाद बचा समय वह मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाने में लगाते हैं गली में लगने वाली यह छोटी सी पाठशाला अब कई बच्चों के लिए उम्मीद की नई किरण बन चुकी है यहां बच्चे हिंदी, अंग्रेजी और गणित जैसे विषय सीखते हैं साथ ही उन्हें अच्छी आदतों और संस्कारों की भी सीख दी जाती है आर्यन की कोशिश है कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।
पहले तो आर्यन ने कैमरे के सामने आने से मन किया लेकिन बाद में आर्यन ने बताया कि मैं चाहता हूं कि जो बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, वो भी पढ़ें और आगे बढ़ें अगर हम सब मिलकर थोड़ा प्रयास करें तो समाज में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। आर्यन की इस पहल की चर्चा अब पूरे मोहल्ले में हो रही है।
स्थानीय लोग भी उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे हैं लोगों का कहना है कि जिस उम्र में बच्चे मोबाइल और खेलकूद में समय बिताते हैं उस उम्र में आर्यन समाज के लिए प्रेरणा बनकर उभरे हैं मोहल्ले के लोग अब बच्चों को खुद इस पाठशाला तक भेज रहे हैं ताकि वे पढ़ लिखकर बेहतर भविष्य बना सकें।
आज के समय में ऐसे बच्चे बहुत कम देखने को मिलते हैं आर्यन जो काम कर रहा है वह समाज के लिए मिसाल है। काशी की गलियों से निकली यह छोटी सी पहल अब एक बड़ा संदेश दे रही है कि अगर इरादे मजबूत हों तो बदलाव की शुरुआत कहीं से भी की जा सकती है आर्यन सोनकर ने यह साबित कर दिया है कि उम्र छोटी हो सकती है लेकिन सोच बड़ी होनी चाहिए। जहां एक तरफ मोबाइल की दुनिया बच्चों को अपनों और समाज से दूर कर रही है वहीं आर्यन जैसे बच्चे शिक्षा की अलख जगा कर समाज को नई दिशा देने का काम कर रहे हैं।






